शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

दो बुँदे

वो बुँदे न बरखा की थी ना
 ना शबनम  की
फिर भी गिर जाती है 
यदा कदा ,
नहीं जानते कहाँ से आ जाती है वो  नमी ,
 बना जाती है जो चेहरे  को सर्द और आँखों को सुखा , 
फिर हम जीने लगते है
 एक अधूरी ही दुनिया में जहाँ  न सपने हैं न उम्मीद की कोई किरण ,
फिर भी उसे  जीना हैं मुक़दर मेरा ..
ईश्वर  का अस्त्तिव तलाशते  तलाशते  खुद  गवा  बैठे अपना अस्तित्व , 
नहीं समझ में आती दुनिया की बाते ,
ढकोसले  ,और पाखंड ,
और वो  जीने नहीं देते  सादगी से ,

लोकतंत्र के छेद ,जो दिखते नहीं डुबोते हैं ..


छोटी छोटी बाते जो बहूत बड़ी हैं , पर इसके  लिए कोई न ही वैचारिक विमर्श होते हैं , न ही चर्चाये , १. हम जैसे युवाओ को किसी नौकरी के लिए फार्म भरना होता हैं तो हम अपने  प्रमाण पत्रों को किसी  राज पत्रित अधिकारी के पास निरिक्षण के लिए ले जाते हैं , कई बार ओ हमे जलील(अनेको प्रकार से कभी हमारी योगता पे सवाल लगा के , कभी दोस्तों या सहकर्मियों से बतियाते हुए और हमे इन्तजार करते हुए ) कर देते है तो कुछ लोग मूल अंक पत्रों से मिला के  हस्ताक्षर कर देते हैं , देखने में ये बहूत छोटी बात हैं पर इसका मंतव्य क्या हैं ? क्या सरकार को अपने ही खोले हुए विद्यालयों और विश्वविद्यालयओ  पे भरोसा   नहीं हैं , या  ये उन अध्यापको, उन संस्थाओ  का  परिहास नहीं हैं जिनके द्वारा पढाये  हजारो छात्र  आज देश की सेवा कर रहे हैं , और वो  भी कही राज पत्रित अधिकारी हैं .
जिनके कुलपति औरआचार्यो  और प्राचार्य  महोदय लोगो की विद्वता का लोहा दुनिया जान चुकी हैं . मेरे समझ से ये अंग्रेजो के ज़माने से आ रही परम्परा हैं जो उन्होंने भारतीय लोगो के लिए की होंगी , ताकि उनकी श्रेष्ठता बनी रहे , अगर आज के युग में दुनिया इतनी आधुनिक हो गई है तो सरकार को शैक्षिक प्रमाण पत्रों की विश्वनीयता के लिए कोई और कदम उठाना चाहिए .
२.अपने ही चित्र को किसी  राज पत्रित अधिकारी से प्रमाणित करवाना ,की ये मैं ही हूँ
3.अस्पतालों  में मरीज लोग पर्ची के लिए लाइन लगते हैं , मैंने  देखा  है कई बार ज्यादे  बीमार लोग जिनके साथ कोई नहीं होता वो  लाइन में लगे होते हैं और हलके फुल्के बीमार लोग  फटा फट पर्ची ले के  चले जाते हैं , सरकार का कर्तव्य , जैसा मैंने पढ़ा  हैं किताबो में  अपने नागरिको  का जीवन सरल बनाना है ,उलटे सरकार आम आदमी की जिंदगी को कष्टकर बना बैठी है,  अगर यही जीवन हैं तो स्कूलों  में पढाये जाने वाले उन  किताबो से इन निमयो , कानूनों  और नैतिकता  की बातो को निकल देना चाहिए . उन किताबो को जला देना चाहिए जो हमे सत्य , अहिंसा  , परोपकार और सभ्यता की बाते सिखाती हैं , क्यों की जीवन  में जब ये भ्रम टूटते है तो दुःख होता हैं और आदमी वही से भ्रष्ट होने लगता हैं
4.राशन कार्ड , ड्राइविंग लाइसेंस ,  वोटर कार्ड और जन्म - मृत्यु  प्रमाण पत्रों में (जिन्हें अक्सर  लोग दर्ज कराते ही नहीं , जो करवाते हैं उनके हाल ) गलत सूचनाये भर देना ( जैसे गलत नाम , पता , उम्र या माता पिता का नाम ) , फिर इनको ठीक करने के लिए  न्यायलय के शपथ  पत्र देना , की मैं ही वास्तविक व्यक्ति हूँ .
५.भारत देश जनसख्या के मामले में विश्व में दुसरे नंबर पे हैं  पर जनसख्या को नियंत्रित करने के लिए कोई व्यापक संसाधन नहीं , भारतीय रेलवे  से ले कर , सार्वजनिक जगहों तक , यहाँ तक की अब तो शोपिंग मालों  में भी अच्छी खासी भीड़ हो रही हैं  जहाँ  से किसी  दुर्घटना के वक़्त निकलना टेडी खीर हैं.

सोमवार, 17 जनवरी 2011

मेरी तकदीर

तुम चाँद हो
एक ख्वाब हो
एक किनारा
और मेरी तकदीर में
हैं बस
चाँद को ताकना
ख्वाब को सहेजना
और कश्ती का डूब जाना

तुम बरखा की बुँदे
और बसन्त का बाग़
मैं जेठ की धरती
और सुखी घास ....    

रविवार, 16 जनवरी 2011

मैं

कितने अलहदा हैं मेरे
हालत और ज़ज्बात
दुसरो से ..
हालत मेरे कुछ करने नहीं देते
ज़ज्बात मेरे चुप रहने नहीं देते ..
इसी कशमकश में ...
चार लफ्जों को ..
अफ़साने का शक्ल दे कर
हो जाता हूँ फ़ारिग

वक़्त

वक़्त बदल गया हैं,
पर ज़ज्बात वही हैं
उम्र बढ गई हैं
पर औकात वही हैं         
सोचता हूँ अब भी
उम्र गुजर गई रिश्तो- रस्मो
को निभाने में
पर रिश्तों की बात वही हैं
आज भी रिसते हैं ज़ख्म मेरे
क्यों कि रिश्तों की मार वही हैं

ऐसा भी हैं ....

ग्रह -गोचर और नक्षत्र
हमेशा ही बिगड़े रहे
मानव जीवन में  इनका
बड़ा गुणगान हैं ...
सब अपने- अपने बलवान हैं
सिर्फ जीवन तबाह करना  ही इनका काम हैं ...
और समाज की रस्मे  तो और भी निराली हैं
रिवाजो को पहले निभाओ
भले ही खाने की थाली खाली हैं ...

एक जज्बात

 गर्दिश इन्सा को क्या से क्या बना देता हैं,
 एक भावुक , संवेदनशील को मुर्दा बना देता हैं ,
 गर्दिशो में बने रिश्ते बड़े अनमोल हैं ,
तख्तो- ताज से कीमती उस वक़्त के मीठे बोल हैं ,
इंसा -इंसा  के काम आ जाये तो जीवन भी सफल हैं ,

जैसा मैंने भारत को देखा 

पेट में अन्न  का दाना नहीं हैं
सर पे तपती जेठ की दोपहरी हैं
और कंधे पे सीमेंट की बोरी हैं , 
दिन भर कमाने के बाद भी मिलती नहीं मजूरी हैं .
और इंडिया बसता  हैं ऊचे -२ घरो में
जहाँ  गर्मी और सर्दी का कोई फर्क नहीं ,
बरसात की कीचड़ कोई गर्क नहीं ,



लोग अर्पित कर आते हैं मंदिरों में करोडो रुपये,
और सोने -चांदी  के जेवर
अपने ईश्वर को खुश करने को
और उसी  के रचे बन्दों से करते हैं नफरत
कभी जाती , कभी धरम और कभी  गरीबी के नाम पर 
और अब तो ईश्वर को भी  कोई अफ़सोस नहीं हैं
उसको भी इन्सान का एक बहाना मिल गया हैं ,
और दुनिया को एक नया ज़माना  मिल गया हैं